वक्त का क्या गुनाह है ?

वक्त मै बर्बाद करता हु
वक्त का क्या गुनाह है ?
थम जाये भले ज़िन्दगी
दौड़ने में भी तो इज़्तिरार है
कभी चाय की चुस्कियां ही ले लो ,
उस धुवे में छिपे नशे का सुकून अलग है ..

वक्त मै बर्बाद करता हु
वक्त का क्या गुनाह है ?
इन दूरियों का भले हो गम ,
किसी आशिक़ के मोहब्बत का
इख़्तिताम भी हुआ है ,
कभी अपने परिवार से दो लब्ज़ ही कह दो ,
उन पलो में छिपे प्यार का सुकून अलग है ..

वक्त मै बर्बाद करता हु
वक्त का क्या गुनाह है ?
तकदीर भले लिखे ऊपरवाला ,
समय है , गुजर ही जाता है ,
कभी ज़िन्दगी को मुड़कर ही देख लो ,
मुस्कुराइए …
उन दो सालो में छिपे लम्हो का इत्मीनान अलग है ..!

Published by अखिलेश कुलकर्णी

मराठी व इंग्रजी साहित्याला जोपासणारा एक कोवळा लेखक व कवी .

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